कारवार का फ़्रेंड्स कैफ़े। सुबह के नौ बज रहे थे। कोहनियों को काउंटर पर टिकाकर, दोनों हथेलियों के बीच अपना चेहरा रख, ख़्यालों में गुम अनवी कभी दीवार पर टँगी घड़ी को देखती तो कभी गेट की ओर। उसके ...

प्रतिलिपिकारवार का फ़्रेंड्स कैफ़े। सुबह के नौ बज रहे थे। कोहनियों को काउंटर पर टिकाकर, दोनों हथेलियों के बीच अपना चेहरा रख, ख़्यालों में गुम अनवी कभी दीवार पर टँगी घड़ी को देखती तो कभी गेट की ओर। उसके ...