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सरहदों को पहचाता नहीं क्यों तु भी परिंदे

4.6
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सरहदों को पहचाता नहीं क्यों तु भी परिंदे नादाँ आज जमाने ने खड़ा कर दिया इस बात पे तूफाँ दीवाना है या पागल औढ के मौत का कफ़न उड़े नादाँ तुझ पर जहरीली हवा की है कुटिल मुस्कान सरहद ना सही धर्म ही पहचान बना ...

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लेखक के बारे में
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अशोक सपड़ा
समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    mohit kumar
    06 फ़रवरी 2019
    अद्वितीय; ग़ज़ले एवं समसामायिक महत्व के लेख पढने के लिए मेरी profile visit करे एवं यथासंभव मूल्याकंन प्रतिक्रिया दें मुझे आपके बहुमूल्य सुझावों का इंतजार रहेगा।
  • author
    satyam kumar shukla
    05 जुलाई 2020
    andar se Jhag jhorne wali Rachna
  • author
    Anjesh Yadav
    22 जून 2020
    दिल खुश हो गया। अति सुन्दर
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  • author
    mohit kumar
    06 फ़रवरी 2019
    अद्वितीय; ग़ज़ले एवं समसामायिक महत्व के लेख पढने के लिए मेरी profile visit करे एवं यथासंभव मूल्याकंन प्रतिक्रिया दें मुझे आपके बहुमूल्य सुझावों का इंतजार रहेगा।
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    satyam kumar shukla
    05 जुलाई 2020
    andar se Jhag jhorne wali Rachna
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    Anjesh Yadav
    22 जून 2020
    दिल खुश हो गया। अति सुन्दर