साल का आखिरी दिन, जैसे किताब का आखिरी पन्ना क्या याद करूं, क्या समेटूं, जैसे क्या लिखूं, क्या मिटाऊं। हर लम्हा कुछ सिखा गया, कुछ हंसाया, कुछ रुला गया, जीवन के इस सफर में, हर दिन नया ख्वाब सजा ...

प्रतिलिपिसाल का आखिरी दिन, जैसे किताब का आखिरी पन्ना क्या याद करूं, क्या समेटूं, जैसे क्या लिखूं, क्या मिटाऊं। हर लम्हा कुछ सिखा गया, कुछ हंसाया, कुछ रुला गया, जीवन के इस सफर में, हर दिन नया ख्वाब सजा ...