pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

रुखसाना

4.4
11775

ये वो लड़कियाँ हैं जिन्हें अपने नाम का अर्थ नहीं पता। जिनके लिए सुनीता का ‘स’ और रुख़साना का ‘र’ कोई मायने नहीं रखता। मायने रखती है तो चौराहे की लाल बत्ती। भीड़ में खड़ी लम्बी-लम्बी गाड़ियाँ। दौड़ते-भागते ...

अभी पढ़ें
लेखक के बारे में

प्रज्ञा तिवारी वर्तमान में लेखिका के तौर पर मीडिया हाउस तथा कम्यूनिकेशन व कंटेंट एक्सपर्ट के तौर पर कई संस्थाओं के साथ जुड़ी हैं। वे खुद भी शाॅर्ट फिल्में बनाती हैं. इसके पहले वे डेवलपमेंट ऑल्टरनेटिव्स नामक एन.जी.ओ. में पब्लिक रिलेशन्स व प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर कार्यरत थीं. वे नेटवर्क 18 तथा दूरदर्शन में कार्य कर चुकी हैं. प्रज्ञा तिवारी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में स्नातक (लेडी श्री राम कॉलेज) तथा स्नातकोत्तर (हिंदू कॉलेज) किया है. प्रज्ञा तिवारी की एक कविता संकलन ‘कभी सोचा है’ प्रकाशित हो चुकी है जिसकी समीक्षा कई  प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों तथा वेब पोर्टल पर प्रकाशित की गई है. इसके अतिरिक्त इनकी कहानियाँ, आलेख, कविताएँ आदि कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर प्रकाशित होती रहती हैं.  प्रमुख उपलब्धियाँ: कोका कोका की फिल्म का कहानी व स्क्रिप्ट लेखन वूमेन प्रेस कोर द्वारा पुरस्कृत श्री भारत भूषण अग्रवाल सृजनात्मक लेखन पुरस्कार विष्णु प्रभाकर साहित्य सम्मान नवोदित लेखन (कविता) पुरस्कार है बातों में दम पुरस्कार (हिंदुस्तान टाइम्स व गूगल की पहल)  लेखनी के अलावा प्रज्ञा एक फोटोग्राफर, शूटर (राइफल) तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत (गायन तथा सितार) में प्रभाकर भी हैं.    

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Ram Bhai
    02 ऑगस्ट 2018
    जो आपने चित्रण किया बखूबी ,लाजवाब है । गरीबी ,क्या क्या करा लेती है जिंदगी से,और ये समझना कठिन हो जाता है।
  • author
    खुशबू बंसल
    10 डिसेंबर 2019
    बहुत ही मार्मिक चित्रण।
  • author
    14 जुन 2016
    ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या पर अच्छी कहानी। सच्चाई के काफी करीब के एंगल से फ्लेश ट्रेड के लिए मजबूर हो जीवन बिताने की मजबूरी।
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Ram Bhai
    02 ऑगस्ट 2018
    जो आपने चित्रण किया बखूबी ,लाजवाब है । गरीबी ,क्या क्या करा लेती है जिंदगी से,और ये समझना कठिन हो जाता है।
  • author
    खुशबू बंसल
    10 डिसेंबर 2019
    बहुत ही मार्मिक चित्रण।
  • author
    14 जुन 2016
    ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या पर अच्छी कहानी। सच्चाई के काफी करीब के एंगल से फ्लेश ट्रेड के लिए मजबूर हो जीवन बिताने की मजबूरी।