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नाम बदनाम

4.1
558

१ नाम तो छोटा ही था, बदनाम बड़ा हो गया । पहले छुपाता था चेहरा , अब सारे आम हो गया। जमाने की मेहरबानी , प्यादा बजीर हो गया । २ मैं अपनी खूबियाँ गिनाता रहा , वो मेरी खामियां गिनता रहा । नुमाइश तो ...

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लेखक के बारे में

विज्ञान पारास्नातक ,भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी (सेवा निवृत), मूल रूप से झाँसी निवासी , कोचिन में निवासरत। पूर्व सहायक आयुक्त सीमाशुल्क । लिखने पढ़ने का शौक है कुछ पुस्तकें प्रकाशित। उल्लेखनीय पुस्तके, संवाद (कविता संग्रह), लुटेरों का टीला,चंबल( लघु उपन्यास), अष्ट योगी(लघु उपन्यास),

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