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मूर्ति

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4.4

पाषाण की मूरत हूँ मैं, चेतना की शून्यता में। झेल जाती सब बलाएँ, ग्रीष्म, बारिस और सर्दी। कभी मेरे रूप को ये फैला जाती, कभी अपनी चित्रकारी का रूप देकर, ठंड की सिकुड़न में संभाल लेती। किस बोध की...