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मेरे गाँव की पगडंडी

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खेतों के बीच सरकती बेरोक चली जाती थी पगडंडी मेरे गाँव की। नहीं बंधन किसी बाँध का पार कर बेधड़क दौड़ पड़ती थी थोड़ी दूर तक सबके साथ। फिर पार करती थी परती जमीनों को खैरा के तथाकथित वनों को गन्ने के खेतों ...