आज मैं भी एक गुनाह, कर जाऊँ क्या! कत्ल उनका हो आज, सँवर जाऊँ क्या! समन्दर समेट रखा है जुल्फ़ों में, उन की लटों में बिखर जाऊँ क्या! दूर रहे नजर से अक्सर उन्हें रहा शिकवा, अब आंख की पुतलियों में उतर ...

प्रतिलिपिआज मैं भी एक गुनाह, कर जाऊँ क्या! कत्ल उनका हो आज, सँवर जाऊँ क्या! समन्दर समेट रखा है जुल्फ़ों में, उन की लटों में बिखर जाऊँ क्या! दूर रहे नजर से अक्सर उन्हें रहा शिकवा, अब आंख की पुतलियों में उतर ...