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लड़कियां बड़ी हो रहीं हैं

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लड़कियां बड़ी हो रहीं हैं न धूप का पता न छांव का पता अपने में मशगूल है लड़कियां घर के आकाश में सिमटना नहीं चाहती पूरी धरती को बना लेना चाहती हैं घर भीगतीं हैं पहली बारिश में छोड़ती हैं अपना रंग धरती...

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लेखक के बारे में
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मनीषा जैन

शिक्षा- पी एच डी-जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली, एम ए हिन्दी साहित्य, यू जी सी नेट( हिन्दी) प्रकाशित कृति - एक काव्य संग्रह ‘रोज गूंथती हूं पहाड़’ प्रकाशित। प्रकाषित साझा काव्य संग्रह - 1-सारांश समय का, 2-कविता अनवरत पत्र पत्रिकाओं में कविता प्रकाशन- लोक स्वामी, नई धारा, गाथांतर, उम्मीद, संप्रेषण, नया पथ, अलाव, वर्तमान साहित्य, संप्रेषण, मुक्तिबोध, बयान, साहित्य भारती, आकंठ, कृतिओर, रचनाक्रम, जनसत्ता, विपाशा (हिमाचल प्रदेश), भाषा स्पंदन (बंगलूरू), छत्तीसगढ़ मित्र, परिकथा, जनपथ, अभिनव इमरोज, , आगमन आदि समीक्षाओं का प्रकाशन- डा. सुनीता जैन-ओक भर जल, टेशन सारे, हेरवा की समीक्षा, डा. जितेन्द्र श्रीवास्तव-बिलकुल तुम्हारी तरह कायातंरण की समीक्षा, कवि विजेन्द्र-आंच में तपा कुंदन ‘बूंद तुम ठहरी रहो ’आलोचना केन्द्रित पुस्तक, बनते मिटते पांव रेत में , एकान्त श्रीवास्तव-धरती अधखिला फूल है की समीक्षा, आनंद स्वरूप श्रीवास्तव-नीम की दुनिया में हम, डा. कमल कुमार-घर और औरत, डा. पद्मजा शर्मा - मैं बोलूंगी -कृति ओर आलेख-गीतकार-नईम-अलाव, कवि नागार्जुन-अलाव, मीरा का संघर्ष-युद्धरत आम आदमी, अज्ञेय-साहित्य भारती लखनउ, सत्यं शिवं में समाई है लोक कविता-कृति ओर, महावीर प्रसाद द्विवेदी-आचार्य स्मारिका, शमशेर-साहित्य भारती, प्रेमचंद-साहित्य भारती, स्त्री विषयक लंबा आलेख हमरंग ई पत्रिका में, साझा पुस्तक में प्रकाशनाधीन, कविता के अंर्तराष्ट्रीय बेव र्पोटल कविता कोश में कविताएं सम्मिलित। जनसत्ता तथा अभिनव इमरोज़ में बाल कविताएं प्रकाशित। पहली कहानी -चाय का खाली मग, ‘सिर्फ तुम’ कहानी संग्रह में संकलित स्त्रीकाल डाॅट काॅम, पहली बार डाॅट काॅम, म.दमूेण्पद आदि ब्लाग पर कविताएं प्रकाशित। लोकस्वामी, जनसत्ता, विपाशा, जनपथ, परिकथा, रचनाक्रम, अनुसिरजण, शैक्षिक दख़ल, गाथातंर आदि विभिन्न पत्रिकाओं में रेखाचित्र प्रकाशित। सम्मान - भारतीय साहित्य सृजन संस्थान पटना तथा कथा सागर पत्रिका के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कथा सागर सम्मान-2013

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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    18 अक्टूबर 2015
    "मशगूल , पौंछना " जैसे शब्द राष्ट्र  भाषा  ज्ञान को  बढ़िया से दर्शा रहे हैं । अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
  • author
    Anand Swaroop Srivastava
    19 अक्टूबर 2015
    लडकी की वेदना  और उसके जीवन संघर्ष को कविता  मे बडे कौशल से व्यक्त किया  गया  है।
  • author
    gaurav awasthi
    13 अक्टूबर 2015
    aadhi aabadi ki nyi soch aur hausle ko darshane vali kavita
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    18 अक्टूबर 2015
    "मशगूल , पौंछना " जैसे शब्द राष्ट्र  भाषा  ज्ञान को  बढ़िया से दर्शा रहे हैं । अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
  • author
    Anand Swaroop Srivastava
    19 अक्टूबर 2015
    लडकी की वेदना  और उसके जीवन संघर्ष को कविता  मे बडे कौशल से व्यक्त किया  गया  है।
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    gaurav awasthi
    13 अक्टूबर 2015
    aadhi aabadi ki nyi soch aur hausle ko darshane vali kavita