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​लड़की

3.8
565

समझती है चतुर खुद को नकचढ़ी ​लड़की बिगड़ती बिन बात के भी नासमझ लड़की। . छींकती है, खाँसती है आंग्ल भाषा में खुली आँखों पाल सपने नवल आशा के नहीं शृद्धा, तर्क की जय बोलती हरदम भड़कती है, अकड़ती है नासमझ लड़की...

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लेखक के बारे में
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संजीव वर्मा

नाम: संजीव वर्मा 'सलिल' जन्म: २०-८-१९५२, मंडला मध्य प्रदेश. माता-पिता: स्व. शांति देवी - स्व. राज बहादुर वर्मा प्रेरणास्रोत: बुआश्री महीयसी महादेवी वर्मा शिक्षा: त्रिवर्षीय डिप्लोमा सिविल अभियांत्रिकी, बी.ई., एम. आई. ई., विशारद, एम. ए. (अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र), एलएल. बी., डिप्लोमा पत्रकारिता, डी. सी. ए. संप्रति: पूर्व कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग म. प्र., अधिवक्ता म. प्र. उच्च न्यायालय, अध्यक्ष अभियान जबलपुर, महामंत्री राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद, संरक्षक राजकुमारी बाई बाल निकेतन, संयोजक विश्व हिंदी परिषद। प्रकाशित कृतियाँ: १. कलम के देव (भक्ति गीत संग्रह १९९७), २. भूकंप के साथ जीना सीखें (जनोपयोगी तकनीकी १९९७), ३. लोकतंत्र का मक़बरा (कविताएँ २००१), ४. मीत मेरे (कविताएँ २००२), ५. काल है संक्रांति का नवगीत संग्रह, ६. कुरुक्षेत्र गाथा। संपादन: (क) कृतियाँ: निर्माण के नूपुर (अभियंता कवियों का संकलन १९८३), नींव के पत्थर (अभियंता कवियों का संकलन १९८५), राम नाम सुखदाई १९९९ तथा २००९, तिनका-तिनका नीड २०००, सौरभः २००३,यदा-कदा २००४, द्वार खड़े इतिहास के २००६, समयजयी साहित्यशिल्पी प्रो. भागवतप्रसाद मिश्र 'नियाज़' २००६, काव्य मंदाकिनी २००८ व २०१०। (ख) स्मारिकाएँ: शिल्पांजलि १९८३, लेखनी १९८४, इंजीनियर्स टाइम्स १९८४, शिल्पा १९८६, लेखनी-२ १९८९, संकल्प १९९४,दिव्याशीष १९९६, शाकाहार की खोज १९९९, वास्तुदीप २००२, इंडियन जिओलॉजिकल सोसाइटी सम्मलेन २००४, दूरभाषिका लोक निर्माण विभाग २००६, निर्माण दूरभाषिका २००७, विनायक दर्शन २००७, मार्ग (IGS) २००९, भवनांजलि (२०१३), अभियंता बंधु (IEI) २०१३ ​ (ग) पत्रिकाएँ: चित्राशीष १९८० से १९९४, एम.पी. सबॉर्डिनेट इंजीनियर्स मंथली जर्नल १९८२ - १९८७, यांत्रिकी समय १९८६ - १९९०, इंजीनियर्स टाइम्स १९९६ - १९९८, एफोड मंथली जर्नल १९८८ - ९०, नर्मदा साहित्यिक पत्रिका २००२ - २००४। भूमिका लेखन: २८ पुस्तकें।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Kumar Prashant
    09 अक्टूबर 2018
    लड़की के खाँसने, छीकने और ज़ोर से खिलखिलाने और बड़ो के आगे घूंघट न करने से उसके आस-पास वाले तथाकथित अपनो के अंदर का भेड़िया जग जाता है। पता नही किसकी बनाई सीमाओ को ना लाँघने का दारोमदार है उनपर...👎
  • author
    25 अप्रैल 2022
    बढ़िया रचना।
  • author
    Vinay Tiwari
    17 फ़रवरी 2020
    average
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  • author
    Kumar Prashant
    09 अक्टूबर 2018
    लड़की के खाँसने, छीकने और ज़ोर से खिलखिलाने और बड़ो के आगे घूंघट न करने से उसके आस-पास वाले तथाकथित अपनो के अंदर का भेड़िया जग जाता है। पता नही किसकी बनाई सीमाओ को ना लाँघने का दारोमदार है उनपर...👎
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    25 अप्रैल 2022
    बढ़िया रचना।
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    Vinay Tiwari
    17 फ़रवरी 2020
    average