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हिन्दी

लाशें ही बोलेंगी

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4.6

ये वक्त चींटी की तरह काटता है. कैसे समझाऊँ? स्क्रॉल करते करते रूह बेज़ार हो जाती है , अपने अन्दर की अठन्नी अपना चवन्नी होना स्वीकार नहीं पाती. ये वक्त के केंचुए अक्सर मेरी पीठ पर रेंगते हुए झुरझुरी ...