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खुद ही सुधर जाओ

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*खुद ही सुधर जाओ* किसको कितना सुधारोगे, थकावट हो जाएगी तुम्हारी छवि भी औरों के, आगे बिगड़ जाएगी सबकी अपनी आदत है, सबके अपने संस्कार फिर क्यों हम करें किसी से, आए दिन टकरार जो जैसा कर्म करेगा, वो फल ...

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लेखक के बारे में
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Mukesh Modi

बीकानेर राजस्थान निवासी हूं। न्यायपालिका में सेवारत रहते हुए कविताओं के प्रति रुचि जागृत हुई। आध्यात्मिक, नैतिक मूल्यों व सकारात्मक विचारों को जागृत करने वाली ओजस्वी कविताएं लिखता रहता हूं। यही ध्येय है कि ऐसी कविताएं पढ़कर समाज की हर पीढ़ी को प्रेरणा मिलती रहे ताकि स्वस्थ, स्वच्छ व मल्यनिष्ठ समाज की पुनर्स्थापना हो सके।

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