.तुम्हें पाने की चाह नही अब समझाना कबसे तुझे चाहती हूँ। छुपे हैं आँखों में दर्द कितने सारे, कुछ और अब ना चाहती हूँ। तुम्हें पाने की चाह नही अब। समझाना कबसे तुझे चाहती हूँ। चलो ! आये हो तो कुछ ...
.तुम्हें पाने की चाह नही अब समझाना कबसे तुझे चाहती हूँ। छुपे हैं आँखों में दर्द कितने सारे, कुछ और अब ना चाहती हूँ। तुम्हें पाने की चाह नही अब। समझाना कबसे तुझे चाहती हूँ। चलो ! आये हो तो कुछ ...