जली है फिर से रोटी आज जरूर तुम्हारे पैरों की बिवाईयों में फिर से टीस उठी है यूं ही नहीं आँच का ताप बढ़ा है एक मुद्दत हुयी स्वाद बदले हुए सुकून के लम्हों की दस्तकें शायद ऐसी ही हुआ करती हैं जहाँ ...

प्रतिलिपिजली है फिर से रोटी आज जरूर तुम्हारे पैरों की बिवाईयों में फिर से टीस उठी है यूं ही नहीं आँच का ताप बढ़ा है एक मुद्दत हुयी स्वाद बदले हुए सुकून के लम्हों की दस्तकें शायद ऐसी ही हुआ करती हैं जहाँ ...