फूल नहीं हूँ जो मुरझाकर तोड़ दी जाऊँ,
पत्थर हूँ—खामोशी से तराशी जाऊँ।
चोटें लगीं तो बिखरी नहीं मैं कभी,
हर वार ने मुझे और मुकम्मल किया अभी।
दुनिया खुद से मोहब्बत करना जानती है,
औरत की ख़ामोशी को अक्सर कमज़ोरी मानती है।
मगर मैं नर्म भी हूँ, और अडिग भी,
मेरी शराफ़त ही मेरी सबसे बड़ी जिद भी।
अब बेख़ौफ़ उड़ना है, बिना शोर मचाए,
हर तूफ़ान को अपने वजूद से झुकाए।
खुद को पहचानकर अपनी राह चुनूँगी,
हर मुक़ाम पर शान से अपनी पहचान लिखूँगी।
कुछ खास नहीं…
बस एक औरत हूँ जो सपने पालती है,
और उन्हें पूरा करने का सलीक़ा जानती है। ✨👑
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