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हे पुरूष क्या मिलेगा मुझे थोड़ा प्यार

4.3
470

मैं औरत एक देह हूँ ! तभी तो कभी बिन अंगिका के पुरूषों के बिस्तर तक सिमटी ! कभी दिवार की पोस्टर पे खुले खुले बदन चिपकी सी ! कभी वस्तुओं के डिब्बे पे साबुन की झाग जैसी बुलबुले लेते हूँ ! कभी मंडी में ...

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समीक्षा
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  • author
    Naveen Pawar
    22 जनवरी 2022
    आदरणीया महोदया जी आपकी कवितावली बहुत खुबसुरत होती है उपयुक्तता लफ्ज दिल की गहराई मे अमिट छाप छोड जाते है
  • author
    15 फ़रवरी 2020
    क्या मिलेगा हे स्त्री, यू खुद को कमजोर मान कर आप समर्थ हैं, चलिए जरा मंसूबे कठोर ठान कर सुंदर रचना
  • author
    02 मई 2018
    अपने वजूद को सही मुकाम हासिल करा ने का सफल प्रयास किया है आपने कविता में बहुत सुंदर जी
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    Naveen Pawar
    22 जनवरी 2022
    आदरणीया महोदया जी आपकी कवितावली बहुत खुबसुरत होती है उपयुक्तता लफ्ज दिल की गहराई मे अमिट छाप छोड जाते है
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    15 फ़रवरी 2020
    क्या मिलेगा हे स्त्री, यू खुद को कमजोर मान कर आप समर्थ हैं, चलिए जरा मंसूबे कठोर ठान कर सुंदर रचना
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    02 मई 2018
    अपने वजूद को सही मुकाम हासिल करा ने का सफल प्रयास किया है आपने कविता में बहुत सुंदर जी