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ग़ज़ल

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4.4

आज इन लबों को थरथराने दो, और कोई बात न करो। पलकों की कोरों को गुनगुनाने दो और कोई बात न करो। ज़िंदगी में खुशियाँ भी आईं तो दुखों की बारात लेकर, खुशियों को खिलखिलाने दो दुख की कोई बात न करो। अश्क उदास...