pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

दूसरी औरत

4.4
164617
स्त्री-विमर्श

सब कुछ अचानक ही हो गया था जैसे। सगाई और ब्याह के बीच का फासला इतना कम रहा कि उसे और कुछ सोचने-बूझने का अवसर ही नहीं मिला। कपड़े की गुड़िया के समान उसे यहां से वहां ऐसे कर दिया गया जैसे उसका अपना कोई ...

अभी पढ़ें
लेखक के बारे में

हिन्दी और राजस्थानी में कवि, कथाकार, समीक्षक और संस्कृतिकर्मी के रूप में सुपरिचित। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संवाद और अनुवाद आदि विधाओं में निरन्तर लेखन और प्रकाशन। जनसंचार माध्यमों में सम्पादन, लेखन, कार्यक्रम नियोजन, निर्माण और पर्यवेक्षण के क्षेत्र में चार दशक का कार्य-अनुभव। प्रकाशन : राजस्थानी में - अंधार पख (कविता संग्रह) ,दौर अर दायरौ (आलोचना), सांम्ही खुलतौ मारग (उपन्यास), बदळती सरगम (कहाणी संग्रह), हिन्दी में – ‘झील पर हावी रात’, ‘हरी दूब का सपना’ और ‘आदिम बस्तियों के बीच’ (कविता संग्रह), आपसदारी (कहानी संग्रह), संवाद निरन्तर (संवाद-संग्रह), साहित्य परम्परा और नया रचनाकर्म (आलोचना)  और संस्कृति जनसंचार और बाजार (मीडिया पर निबंधों का संग्रह)। सम्पादन : राजस्थानी  साहित्यिक पत्रिका ´हरावळ´ का संपादन। राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित काव्‍य- संकलन “रेत पर नंगे पांव”, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नई दिल्ली से राजस्थानी की प्रतिनिधि कहानियों के संकलन “तीन बीसी पार” और साहित्‍य अकादमी, नई दिल्‍ली से आधुनिक राजस्‍थानी काव्‍य का प्रतिनिधि संकलन ‘जातरा अर पड़ाव’ का संपादन । सम्मान : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा गद्य पुरस्‍कार, मारवाड़ी सम्मेलन, मुंबई द्वारा सर्वोत्‍तम साहित्‍य पुरस्‍कार,  केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, दूरदर्शन विशिष्ट सेवा पुरस्कार , के.के. बिड़ला फाउंडेशन का बिहारी पुरस्कार और  सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के भारतेन्‍दु  हरिश्‍चन्‍द्र पुरस्‍कार तथा राजस्‍थानी भाषा साहित्‍य और संस्‍कृति अकादमी, के ‘सूर्यमल्‍ल मीसण शिखर पुरस्‍कार से सम्‍मानित।

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satish Pareek
    26 फेब्रुवारी 2019
    नंद जी, सटीक चित्रण। गांवों में ऐसे मामले सामान्य हैं। मैं स्वयं ऐसे हालात का गवाह रहा हूँ। शादी के 14 वर्षों बाद 4 बच्चे पैदा कर के पुरुष देवलोक कूच कर गया। पहले वाली से शादी के वक्त 10 साल का लड़का था। न जाने कितनी मासूमों के जवां ख्वाब अब भी कुचले जाते हैं। हाँ, अब थोड़ी बयार बदलने लगी है, कारण शिक्षा व सामाजिक बदलाव तो है ही मीडिया का भी सक्रिय योग है। अब ऐसे लोग विधवा को भी स्वीकार कर रहे हैं। अब मेरा देश बदल रहा है, फिर भी गांवों में सामाजिक बदलाव धीमी गति से हो रहा है। हमें इस बदलाव में सहयोग करना ही होगा। नायक को आत्म ग्लानी है, मगर अधिकतर मामलों में इसे वीरता व पुरुषत्व से संबोधित किया जाता है वहीं कई जगह दमित लड़कियां बदले की भावना भी रखती हैं। अधिकांशतः, नायिका की तरह व्यवहार करती हैं।
  • author
    Sahadev Choudhary
    18 जानेवारी 2017
    purush wadi aadrsh kab khatm honge..? kyu purush ko aapni bhool ka ehsaas bhool karne k bad hota hai..? kisi ki jindgi ko tabah karne k bad kaisa pashchataap!
  • author
    ajay Upadhyay
    24 फेब्रुवारी 2018
    एक लड़की जो की इस्त्री बन कर नारी के सम्मान को बहुत ऊंचा कर दिया शायद नारी तेरी यही कहानी अंचल में दूध और आंखों में पानी ॥
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satish Pareek
    26 फेब्रुवारी 2019
    नंद जी, सटीक चित्रण। गांवों में ऐसे मामले सामान्य हैं। मैं स्वयं ऐसे हालात का गवाह रहा हूँ। शादी के 14 वर्षों बाद 4 बच्चे पैदा कर के पुरुष देवलोक कूच कर गया। पहले वाली से शादी के वक्त 10 साल का लड़का था। न जाने कितनी मासूमों के जवां ख्वाब अब भी कुचले जाते हैं। हाँ, अब थोड़ी बयार बदलने लगी है, कारण शिक्षा व सामाजिक बदलाव तो है ही मीडिया का भी सक्रिय योग है। अब ऐसे लोग विधवा को भी स्वीकार कर रहे हैं। अब मेरा देश बदल रहा है, फिर भी गांवों में सामाजिक बदलाव धीमी गति से हो रहा है। हमें इस बदलाव में सहयोग करना ही होगा। नायक को आत्म ग्लानी है, मगर अधिकतर मामलों में इसे वीरता व पुरुषत्व से संबोधित किया जाता है वहीं कई जगह दमित लड़कियां बदले की भावना भी रखती हैं। अधिकांशतः, नायिका की तरह व्यवहार करती हैं।
  • author
    Sahadev Choudhary
    18 जानेवारी 2017
    purush wadi aadrsh kab khatm honge..? kyu purush ko aapni bhool ka ehsaas bhool karne k bad hota hai..? kisi ki jindgi ko tabah karne k bad kaisa pashchataap!
  • author
    ajay Upadhyay
    24 फेब्रुवारी 2018
    एक लड़की जो की इस्त्री बन कर नारी के सम्मान को बहुत ऊंचा कर दिया शायद नारी तेरी यही कहानी अंचल में दूध और आंखों में पानी ॥