डायरी लेखन ... यूँही चलते चलते कभी कभी मन में कुछ भाव उठते हैं और कागज पर उतर जाते हैं। कभी किसी से कुछ कहने का मन होता है और न कह पाने पर शब्द बिखर जाते हैं और कभी स्वयं को समझाने के लिये ही ...
क्या लिखूँ खुद के बारे में ..शब्दों से बना तन मेरा भाव रुधिर बहता है ।सामाजिक ताने बाने नस ,हड्डियों का ढाँचा है। अहसास बने वस्त्र मेरे यही स्वरूप देखा है।
पाखी प्रतीक है तो मनोरमा भी एक निशान है ।
सारांश
क्या लिखूँ खुद के बारे में ..शब्दों से बना तन मेरा भाव रुधिर बहता है ।सामाजिक ताने बाने नस ,हड्डियों का ढाँचा है। अहसास बने वस्त्र मेरे यही स्वरूप देखा है।
पाखी प्रतीक है तो मनोरमा भी एक निशान है ।
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