सोचता हूं तो तड़पता है मन
मनुष्य है क्या
किस तरह बढ़ रहा है।
ना जात पात धर्म-कर्म रंग रूप का भेदभाव मिटेगा
कबतक ऐसा ही चलता रहेगा
ऐसा कोई नहीं धर्म को मिटा सके
ऐसा कोई नहीं जो दुःख को मिटा सके
इससे अच्छा तुम ना धर्म ना दुःख को मानों
जिंदगी को अल्फ़ाज़ में बयान करना चाहा
हर दिन लिखता जा रहा
हर दिन छुटता जा रहा
हर पल क़ैद करता जा रहा
मैं शब्दों से दुनिया बदलने चला
पता चला कि दुनिया ने शब्दों को बदल दिया
लिखने को बहुत कुछ है और