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दर्द भी......

4.2
581

दर्द भी गुज़रती रात का सिला देता है तमाम उम्र गुज़ारने की वजह देता है बेरुखी को हाथों से मल रहा है मौसम मुझे वो अंधेरे से मिला देता है हर लम्हा खर्च हो रहा है आजकल शाम का मुकद्दर मुझे जला देता है...

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लेखक के बारे में

मैं राजेश बलूनी ,मूलतः,उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले का निवासी हूँ ,कविता लेखन और गायन की बालयावस्था से ही रुचि रही है ,जब भी मन में कोई विचार आता है ,तो कागज़ की सतह पर लिख देता हूँ,बहुत सी त्रुटियां होंगी रचनाओं में ,अतः यह नौसिखिया आपसे उसके लिए सदैव क्षमाप्रार्थी है,सुझावों का सदा ही स्वागत है

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    23 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा का पूर्ण रूपेण अनुसरण न करती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
  • author
    Sonia Pratibha Tani
    02 नवम्बर 2018
    bahut sundar rachna
  • author
    05 फ़रवरी 2023
    आपकी रचना के अंत मे भार वाचक शब्दो के समानार्थी शब्द अर्ध भी यदी आपकी और से लिखे होने से उर्दू हिन्दी समझने में मदद मिलेगी। शुभम भवतु।
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    23 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा का पूर्ण रूपेण अनुसरण न करती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
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    Sonia Pratibha Tani
    02 नवम्बर 2018
    bahut sundar rachna
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    05 फ़रवरी 2023
    आपकी रचना के अंत मे भार वाचक शब्दो के समानार्थी शब्द अर्ध भी यदी आपकी और से लिखे होने से उर्दू हिन्दी समझने में मदद मिलेगी। शुभम भवतु।