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छप्पय छंद

4.7
838

1.> हर-हर करती नित्य, जटाओं में माँ गंगे शीतल करती भाल, चन्द्र की रष्मि तरंगें। कण्ठाभूषण बने, भुजंग सुषाोभित ऐसे हों आलिंगनबद्ध, लताएं तरु से जैसे। ‘राजन’ षिव के हृदय में, जगदम्बे का वास है परमपिता ...

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समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    manisha sharma
    30 जुलाई 2022
    superb writer mahoday ji
  • author
    Sudhir Kumar Pal "हम्द"
    31 अगस्त 2019
    अति उत्तम विलक्षण जय महाकाल
  • author
    कुमार अभिनंदन
    07 मई 2019
    बढीया है..राजेंद्र बाबू..
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    manisha sharma
    30 जुलाई 2022
    superb writer mahoday ji
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    Sudhir Kumar Pal "हम्द"
    31 अगस्त 2019
    अति उत्तम विलक्षण जय महाकाल
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    कुमार अभिनंदन
    07 मई 2019
    बढीया है..राजेंद्र बाबू..