बीमारी और उसके बाद अर्पण कुमार कितना कुछ टूट्ने लगता है शरीर और मन के अंदर घर में और घर के बाहर जब घर का अकेला कमाऊ मुखिया बीमार पड़ता है वक़्त ठहर जाता है खिड़की और बरामदे से आकाश पूर्ववत दिखता है मगर गृहस्वामिनी के हृदय के ऊपर सूर्य-ग्रहण और चंद्रग्रहण दोनों कुछ यूँ छाया रहता है कि दिन मटमैला और उदास दिखता है और इस मंथर गति से गुजरता है मानों किसी अनहोनी के इंतज़ार में रूका खड़ा हो रात निष्ठुर और अपशकुन से भरी बीते नहीं बीतती मानों शरीर में चढा विषैले साँप का ज़हर उतारे नहीं उतरता बीमारी का निवास ...

