pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

भिक्षुक

5
7

वो आता है ढोल बजाते हुए हर त्योहार पर और मांगता है दान ढोल की थाप पर बग़ैर किसी देवता के नाम पर मैंने दान कभी नहीं दिया मैं सोचता हूँ दान देने से कुछ नहीं होता सिवाय इसके कि यह अगले त्योहार पर फिर आ ...

अभी पढ़ें
लेखक के बारे में

जहां से शुरू होता हूँ वहां ख़त्म नहीं होता। ख़त्म वहां पर होना चाहता हूँ जहां से शुरू होने की कोई गुंजायश न बचे।

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • रचना पर कोई टिप्पणी नहीं है
  • author
    आपकी रेटिंग

  • रचना पर कोई टिप्पणी नहीं है