हर लम्हा जी रही हूँ ईतनी शान से, ए झिंदगी तुजको बे दाग रखने के लिये जलती रही कीतनी आसान से; कब तक चलते लोग साथ मेरे, अकेली थी जब कदम रखे सच की दो धारी तलवार पे; खुद अपने हो जाते है मुजसे खफा खफा...

प्रतिलिपिहर लम्हा जी रही हूँ ईतनी शान से, ए झिंदगी तुजको बे दाग रखने के लिये जलती रही कीतनी आसान से; कब तक चलते लोग साथ मेरे, अकेली थी जब कदम रखे सच की दो धारी तलवार पे; खुद अपने हो जाते है मुजसे खफा खफा...