अब लगता है मन जीवन का मैं बैरागी हो जाऊँ, सुध-बुध अपनी खोकर मैं तुझमें खो जाऊँ। एक दिन उठूँ सवेरे तड़के, देखूँ मैं उड़ते पंछी को, तरुओं की सरसराहट, पत्तों में खोजूँ जीवन का राग। देखूँ कल-कल पानी...

प्रतिलिपिअब लगता है मन जीवन का मैं बैरागी हो जाऊँ, सुध-बुध अपनी खोकर मैं तुझमें खो जाऊँ। एक दिन उठूँ सवेरे तड़के, देखूँ मैं उड़ते पंछी को, तरुओं की सरसराहट, पत्तों में खोजूँ जीवन का राग। देखूँ कल-कल पानी...