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अपनों से बचो...

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*अपनों से बचो...*                                            इस कलयुग में न कोई राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न होता है । यहां तो खून ही खून से कृतघ्न होता है।कहीं श्रवण कुमार पे तीर चल जाता है। तो ...

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लेखक के बारे में

न मै रंहू , न मेरी आरज़ू रहे, बाकी तू रहे, तेरी रजामंदी रहे ।

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