pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

अधूरा सपना

1

शरद पूर्णिमा की वो रात आज भी याद है मुझको जब दरिया किनारे धवल चाँदनी में हम तुम मिला करते थे बाहों में बाहें डालकर प्यार की मीठी बातें किया करते थे आँखों में ऑंखें डालकर एक सपना देखा करते थे एक छोटा...

अभी पढ़ें
लेखक के बारे में
author
krishna lal
समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • रचना पर कोई टिप्पणी नहीं है
  • author
    आपकी रेटिंग

  • रचना पर कोई टिप्पणी नहीं है