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सृष्टि के प्रथम स्त्री - पुरुष और काम की अवधारणा - वीणा वत्सल सिंह

24 अगस्त 2016

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सृष्टि के आरम्भ के बारे में जब भी सोचना शुरू करती हूँ तो एक बात जो सबसे पहले दिमाग में आती है वह यह कि निश्चित रूप से सृष्टि के आरम्भ विन्दु पर एक स्त्री और एक पुरुष रहे होंगे | और , इस बात की पुष्टि विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों की कहानियों में भी हुआ है |

 


सर्वप्रथम बाईबल की बात करें तो उसमे प्रथम स्त्री – पुरुष के रूप में आदम और हौव्वा ( एडम एवं ईव ) के बारे में उल्लिखित है | हाँ , यहाँ एडम और ईव के बीच किसी प्रकार के अन्य संबंधों की चर्चा नहीं की गई है कि वे भाई – बहन  थे  या  माँ – बेटे | बल्कि उन्हें ईश्वर की संतानें ही कहा गया है | खैर , इस मिथकीय कहानी में ईव के द्वारा एडम को एक फल खाने के लिए प्रेरित करने की बात कही गई है और जिसके खाते ही दोनों में काम की उत्पत्ति होती है – जो इस सृष्टि का कारक है |

 

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हिन्दुस्तानी मिथक में सृष्टि की उत्पत्ति और प्रथम स्त्री – पुरुष के बारे में मुख्यत: दो आख्यान मिलते हैं | पहला आख्यान पुराण से है कि सृष्टि के प्रथम स्त्री – पुरुष यम और यमी थे तथा एक ही ईश्वर के सन्तान होने के कारण उन्हें भाई – बहन के रूप में व्याख्यायित किया गया है | लेकिन इसी की आगे की कथा के अनुसार सृष्टि को आगे बढाने के लिए यमी यम से काम – क्रिया का प्रस्ताव रखते हुए कहती है कि हमें आपस में काम करना चाहिए ताकि सृष्टि भी आगे बढे और ईश्वर के कहे मुताबिक़ अगर हम काम नहीं करेंगे तो हमारी मृत्यु भी निश्चित है | लेकिन , यम यमी को एक ही ईश्वर की सन्तान होने के कारण बहन के रूप में देखते थे अत: वे इसे नकार देते हैं और तुरत उनकी मृत्यु हो जाती है | मरने के बाद भी वे यमलोक में जाकर जीवित रहते हैं क्योंकि उनके कोई पुत्र नहीं धरती पर जो उनकी दैहिक क्रिया करे और इस कारण उनका पुनर्जन्म भी नहीं हो सकता | आगे चलकर वे मृत्यु के देवता के रूप में परिभाषित किये गए और यमी के बारे में कहा जाता है कि वे जल  हो गईं जो यमुना के रूप में जानी जाती हैं | कहीं – कहीं यम को गोधूली बेला और यमी को चाँद – सितारों से भरी रात के रूप में भी परिभाषित किया गया है |

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तीसरी और महत्वपूर्ण कहानी है कि एक बार आदि शक्ति (दुर्गा)के मन में सृष्टि की कामना जगी लेकिन बिना पुरुष के यह संभव नहीं था | अत: उनहोंने अपने सत ,राज और तम  गुण से क्रमशा: तीन पुरुषों ब्रह्मा ,विष्णु एवं शिव की उत्पत्ति की | शक्ति  ने  सबसे पहले ब्रह्मा से काम का अनुरोध किया लेकिन उनहोंने अपनी व्युत्पति का कारक होने के कारण शक्ति को अपनी माँ कहा और ब्रह्मलोक को चले गए | विष्णु ने भी  शक्ति की काम – याचना को माँ कह ठुकरा दिया | लेकिन तम गुण से जन्मे शिव ने स्वीकारा और शर्त रखी कि अपना रूप बदलकर आओ | फिर वही शक्ति सती / पार्वती के रूप में शिव की संगिनी बनी और सृष्टि का विस्तार सम्भव हुआ | कहते हैं वैष्णो देवी की गुफा में यही प्रारम्भिक तीनों गुण – तीन पिंडियों के रूप में स्थापित  हैं | इन तीन मिथकों में एक बात समान है कि सृष्टि के विस्तार की कामना से काम – याचना पहले स्त्री की ओर से ही की गई | यानी , लेखकों ने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि रचने की प्रक्रिया स्त्री की स्वभाविक इच्छा है और इसके लिए वह स्वयं को बंधन मुक्त भी कर लेती है स्वाभाविक तौर पर |

 

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लेकिन , इन मिथकों में सिक्के का एक दूसरा पहलु भी है कि बाईबल में जहां उस “ फल “ के प्रति एडम का नकार भाव और पूरे प्रसंग को एक तरह से अधोपतन के रूप में व्याख्यायित किया गया है वहीं हिन्दुस्तानी मिथकों में भी कमोबेश यही भाव महत्वपूर्ण रहा है | ऐसा शायद इस कारण क्योंकि इन मिथकीय या धार्मिक ग्रंथों की रचना पुरुष लेखकों के  द्वारा की गई है और इन्हों ने अपने पुरुष अहं की तुष्टि के लिए स्त्री को नीचा साबित करना चाहा है | लेकिन , यहाँ यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इसके बावजूद सबों ने स्त्री – पुरुष की परस्पर काम – क्रिया में ही सृष्टि के विस्तार की बात कही है | अत: यह स्पष्ट है कि चाहे  वह अधोपतन हो या एक स्वभाविक प्रक्रिया सृष्टि का विस्तार और सृष्टि का कारक स्त्री ही है |

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साथ  ही  , यह  भी  कि बिना पुरुष के सहयोग के सृष्टि आगे नहीं बढ़ सकती | अत: स्पष्ट है की स्त्री और पुरुष में काम की अवधारणा को लेकर भले ही पहले  और बाद की बात हो लेकिन दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु हैं और एक - दूसरे के सहयोग -साथ के बिना अधूरे हैं | हिन्दुस्तानी वांग्मय  में प्रथम स्त्री और प्रथम पुरुष के रूप में शिव - पार्वती के अर्द्धनारीश्वर रूप की परिकल्पना का भी  आधार  यही  तथ्य है |