दोस्त के भाई से प्यार EP: 1 माली या घर का मालिक?

दोस्त के भाई से प्यार EP: 1 माली या घर का मालिक?

सूरत शहर की सुबह में एक सुनहरी तपिश थी, जो वहां के एक आलीशान बंगले के लॉन में बैठे युवा शख्स के खुले बदन को चमका रही थी।

उस शख्स ने घुटनों के बल बैठे बस पुराना सूती पायजामा पहना था। उसके हाथ कोहनियों तक और पैर घुटनों तक पूरी तरह कीचड़ में सने थे। चेहरे पर भी मिट्टी की ऐसी परतें जमी थीं कि उसकी तीखी नाक और गहरी आँखों के अलावा कुछ भी पहचान पाना नामुमकिन था।

वह बड़ी तल्लीनता से जमीन खोद रहा था, जैसे दुनिया की सारी फिक्र उसी मिट्टी में दफन कर देना चाहता था। उसके पास पेड़ पर बैठे पंछी चहचहा रहे थे, सुबह की इस शांति में उनकी आवाज़ मधुर लोरी सुकून दे रही थी। लेकिन तभी, इस रूहानी शांति में खंजर घोंप गया।

धुम्म-धुम्म-धुम्म...

कान फोड़ देने वाले हॉर्न के साथ एक नीली ओपन-जीप झटके से गेट पर रुकी और म्यूजिक सिस्टम से तेज हरियाणवी पॉप का शोर फूट पड़ा, जिसने परिंदों को डराकर उड़ा दिया।

"व्हाट द हेल..." मिट्टी खोद रहे शख्स का हाथ वहीं रुक गया।

म्यूजिक बंद हुआ, लेकिन शोर नहीं। एक लड़का, जिसकी उम्र मुश्किल से 21-22 साल रही होगी, वो फिल्मी हीरो की तरह उछलकर जीप से बाहर कूदा। उसके बाल बिखरे हुए थे, जैसे उसने हफ़्तों से कंघी न की हो। उसने एक ढीली-ढाली सफ़ेद टी-शर्ट और फटी हुई नीली जींस पहनी थी। उसके गले में हेडफोन लटके थे और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो शायद मुर्दे में भी जान फूंक दे।

वह था विवान। उसने हाथ ऊपर उठाए और गहरी सांस ली, "आह! नया शहर, नया घर और नई शुरुआत! थैंक यू गॉड!"

तभी उसकी नज़र उस मिट्टी खोद रहे शख्स पर पड़ी। वो उसकी ओर पीठ लिए बैठा था। विवान आगे आते हुए ऊंची आवाज में चिल्लाया, "माली काका! ओ काका... सुनिए तो..."

उस शख्स का हाथ मिट्टी के अंदर ही जम गया। माली काका? उसने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी गहरी भूरी आँखों में गुस्सा सुलग उठा।

"तुझे ही बोल रहा हूं ओ कीचड़-मैन! बहरे हो क्या?" विवान ने मटकते हुए उसके करीब आकर अपनी नाक सिकोड़ी, "अरे बाप रे! इतनी गंदगी! तुझे देखकर तो मुझे ही खुजली हो रही है। चल जल्दी बोल, मेरा ये भारी गिटार केस और बैग अंदर ले जाने का कितना लेगा? और सुन, पानी भी लेकर आना, गला सूख गया है मेरा।"

सामने रहा वह शख्स धीरे-धीरे खड़ा हुआ। वह विवान से कम से कम आधा सिर ज्यादा लंबा था, और मिट्टी में सने होने के बावजूद उसके शरीर से एक जबरदस्त डोमिनेटिंग वाइब निकल रही थी।

उसने एक ठंडी, जलती हुई नजर विवान पर डाली तो विवान ने बेपरवाही से हंसते हुए बोला, "अरे! घूर क्या रहा है? शक्ल देखी है अपनी? जरा सलीके से रहा कर भाई, तेरे चेहरे पर तो जैसे किसी ने कोयले की पेंटिंग कर दी है वैसा बना हुआ है। जा, पहले मेरा बैग उठा और अंदर रख कर आ, फिर तुझे बढ़िया टिप भी दूंगा।"

"तुमने मुझे क्या कहा?" उस शख्स की आवाज किसी भारी पत्थर के गिरने जैसी गूंजी।

विवान ने अपना चश्मा नाक तक लाकर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसे देखा, "यही कि... माली काका।" विवान आगे बोलने ही वाला था कि वह शख्स एक कदम आगे बढ़ा, "अपनी हद में रहो, इससे पहले कि मैं तुम्हें इसी मिट्टी में दफन कर दूँ।"

उसकी मर्दाना खुशबू और पसीने की गंध विवान के नथुनों तक पहुँची। विवान एक पल के लिए सहमा, पर फिर अपनी आदत से मजबूर होकर बोला, "अरे-अरे! इतना गुस्सा? सूरत की मिट्टी में मिर्च ज्यादा आ गई है क्या?"

विवान ने हंसते हुए आगे कहा, "सुनिए, आर्यन कहाँ है? उसने कहा था उसका भाई खडूस है, पर उसने ये नहीं कहा था कि वो घर में काम करने वालों को इतनी छूट देता है कि वो मेहमानों से लड़ने लगें। उसकी जगह मैं होता तो तुम्हारी बत्ती गुल कर देता, समझे!"

अभी विवान अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि थोड़ी दूर से एक बुजुर्ग शख्स, रामू काका, हड़बड़ाते हुए आए। विवान की गुस्ताखी देखकर उनके तो जैसे प्राण ही सूख गए।

"अरे-अरे! ओ छोरे! कौन हो तुम? और ये... ये क्या कह रहे हो तुम इनसे?" काका ने कांपती आवाज में विवान को पीछे खींचा।

"इनसे?" विवान ने चश्मा नीचे करके काका को देखा, "अरे काका, ये आपका माली कामचोर है। मैं इसे सामान उठाने को कह रहा हूँ और ये मुझे ऐसे देख रहा है जैसे कच्चा चबा जाएगा। इसे बोलो जरा फुर्ती दिखाए।"

"चुप हो जा अनर्थकारी! अपनी जुबान को लगाम दे!" काका का गला सूख गया। उन्होंने डरते-डरते उस शख्स की तरफ देखा जो अब पत्थर की मूर्ति की तरह स्थिर खड़ा था, फिर विवान के कंधे पर हाथ मारा, "पागल हो गए हो क्या तुम? ये... ये इस घर के बड़े बेटे हैं!"

"क्याआआ?" विवान का मुँह खुला का खुला रह गया। उसका महंगा चश्मा नाक से फिसलकर जमीन पर जा गिरा।

"हाँ!" काका ने जैसे किसी गौरवशाली इतिहास का वर्णन शुरू किया, "ये हैं सूरत के टेक्सटाइल के राजा, प्रताप ग्रुप के मालिक और इस घर के वारिस... अभय प्रताप सिंह!"

जैसे ही अभय नाम गूंजा, उस शख्स ने पास ही पड़ा पानी का पाइप उठाया। उसने नल को पूरी ताकत से घुमाया और पाइप को सीधे अपने सिर के ऊपर रख लिया।

एक झरने की तरह पानी उसके घने काले बालों से होता हुआ उसके चौड़े कंधों और सख्त सीने पर गिरने लगा। जैसे-जैसे पानी का बहाव तेज हुआ, उसके चेहरे और शरीर से कीचड़ की परतें पिघलकर बहने लगीं। देखते ही देखते, धूल और मिट्टी के पीछे छुपा वो तीखा चेहरा, तराशी हुई मांसपेशियां और वो गहरी, रौबदार आँखें साफ़ चमकने लगीं।

उसने फिर पाइप नीचे फेंका और अपने गीले बालों को झटके से पीछे किया। उसकी तीखी नजरें अब विवान के चेहरे पर आकर ठहर गईं।

विवान, जो अब तक उसे मजदूर समझकर धौंस जमा रहा था, अभय की उस मर्दानगी और बाहुबली वाले अवतार को देखकर पूरी तरह सुन्न पड़ गया।

"सामान..." अभय की भारी आवाज गूंजी। उसने एक कदम विवान की तरफ बढ़ाया। "सामान खुद उठाओ। यहाँ कोई नौकर नहीं है, और मेहमानों को पालने का मुझे शौक नहीं।"

तभी बंगले के बड़े दरवाजे से आर्यन भागता हुआ बाहर आया। "भाई! भाई रुकिए, शांत हो जाइए! ये विवान है, मेरा दोस्त।"

आर्यन ने आकर विवान की कोहनी पकड़ी और उसे हिलाया, "पागल है क्या? भाई से पंगा ले लिया आते ही?"

विवान कुछ नहीं बोल पाया। वह बस फटी आँखों से अभय के उस गीले और खुले बदन को देख रहा था, जिसकी हर मांसपेशी उसके रसूख की गवाही दे रही थी। उसे अहसास हुआ कि उसने सिर्फ एक इंसान से नहीं, बल्कि एक तूफान से टक्कर ले ली थी।

"भैया... मैंने आपसे कहा था ना कि मेरा दिल्ली वाला फ्रेंड दो महीने के लिए सूरत आ रहा है? ये वही है।" आर्यन ने डरते-डरते कहा।

अभय के माथे पर नसें उभर आईं, "ये? ये नमूना तुम्हारा दोस्त है?"

"नमूना?" विवान ने आर्यन के पीछे छुपते हुए कहा, "स... सॉरी माली..." वो हड़बड़ाया और अभय ने आँखें लाल की तो वो फौरन हाथ आगे कर बोला, "आई मीन मुझे लगा ये घर का माली है। ल... लेकिन उसमे मेरी क्या गलती? ये हुलिया ही वैसा रख कर बैठे थे!"

उसने मासूम आँखें कीं, पर अभय शेर की तरह उसे घूरता रहा।

"विवान! चुप हो जा!" आर्यन ने बीच में उसका हाथ दबाया, "भैया, यहाँ सूरत में सुर-संगम का बहुत बड़ा म्यूजिक इवेंट है दो महीने का, विवान उसी के लिए आया है, तो मैंने इसे यहाँ रुकने के लिए कहा।"

अभय ने विवान को ऊपर से नीचे तक देखा, उसके बिखरे बाल, उसकी चंचल आँखें और वो बेबाक अंदाज, "आर्यन, इसे अभी इसी वक्त किसी होटल में ले जाओ। मुझे अपने घर में ये लड़का नहीं चाहिए।"

"नहीं भैया! मॉम ने हाँ कर दी है। और विवान बहुत अच्छा लड़का है, बस थोड़ा बातूनी है।" आर्यन ने विनती की। विवान ने भी ये सुन बत्तीसी चमका दी और फिर इधर-उधर देखते हुए हल्की सीटी बजाने लगा।

अभय अब बिना कुछ कहे अंदर जाने लगा। जाते-जाते विवान ने पीछे से देखा तो अभय की पीठ पर अभी भी थोड़ा कीचड़ था।

उससे रहा नहीं गया और चिल्लाया, "सुनिए सर! पीठ साफ करने के लिए साबुन अच्छी क्वालिटी का इस्तेमाल कीजिएगा, पीछे लगे दाग बड़े जिद्दी लग रहे हैं! इतना पानी डालने पर भी गए नहीं... और पता नहीं इस हॉट बॉडी में कहाँ-कहाँ दाग लग गए होंगे!"

"विवान!" आर्यन ने आँखें दिखाईं। अभय के कदम भी रुके, उसने पीछे मुड़कर विवान को एक ऐसी जानलेवा नजर से देखा कि विवान की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

अभय फिर अंदर चला गया। उसके बगीचे की शांति अब राख हो चुकी थी।

"चल आर्यन, मुझे भी अंदर लेकर चल, बहुत गर्मी है बाहर। और वैसे तेरा भाई थोड़ा ज्यादा सड़ा हुआ नहीं है? इसे बोलो धूप में कम बैठा करे, वरना सूरज से भी ज्यादा हॉट हो जाएगा।" विवान अपनी बकबक शुरू किये सामान उठाने लगा और आर्यन मुंडी हिलाते हुए उसे घर के अंदर खींच ले गया।

जैसे ही विवान ने घर के दहलीज पर कदम रखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। बाहर से जो बंगला सिर्फ बड़ा लग रहा था, अंदर से वह किसी राजसी हवेली और मॉडर्न आर्ट गैलरी का मेल था। ऊँची छतें, दीवारों पर लगी कीमती पेंटिंग्स और पॉलिश किया हुआ सागवान का फर्नीचर, हर चीज़ से अनुशासन और पैसे की महक आ रही थी।

विवान अपना गिटार केस कंधे पर टिकाए, गर्दन घुमा-घुमा कर सब कुछ देख रहा था।

"ओए होए आर्यन! ये तेरा घर है या 'हम साथ-साथ हैं' की शूटिंग का सेट? यहाँ तो फर्श इतना चमक रहा है कि मैं इसमें अपनी शक्ल देख कर बाल बना लूँ।" विवान ने सूटकेस घसीटते हुए अपनी बकबक जारी रखी।

आर्यन ने मुस्कुराते हुए उसे अंदर खींचना शुरू किया, "चुप कर ड्रामेबाज़! धीरे बोल, भाई ऊपर ही हैं।"

"अरे भाई होंगे अपने बेडरूम में, यहाँ नीचे तक थोड़े ही न उनके कान लगे हैं।" विवान ने हॉल के बीचों-बीच खड़े होकर एक लम्बी सीटी बजाई, "वैसे मानना पड़ेगा, तेरे भाई का टेस्ट साड़ियों में ही नहीं, घर सजाने में भी एकदम 'क्लासिक' है। पर यार... इतनी शांति? यहाँ कोई छींकता भी है तो क्या फाइन भरना पड़ता है?"

आर्यन का चेहरा थोड़ा गंभीर हुआ, "विवान, हँसी-मजाक अपनी जगह है, पर एक बात याद रखना। भाई ने ये सब कुछ... ये घर, ये शोहरत, ये कंपनी... अपनी कड़ी मेहनत और खून-पसीने से बनाई है।"

विवान की चंचलता थोड़ी कम हुई। उसने आर्यन की आँखों में अपने भाई के लिए वो गहरा सम्मान देखा।

"इसीलिए!" आर्यन ने आगे कहा, "मैं भी उनकी कोई बात कभी नहीं टालता। वो मेरे लिए सिर्फ बड़े भाई नहीं, बाप की जगह हैं। और वो..."

"वो क्या?" विवान ने उत्सुकता से पूछा।

आर्यन की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी आ गई, "और वो... वो मॉम की कोई बात नहीं टालते। अगर मॉम ने कह दिया कि तुम यहाँ रुकोगे, तो दुनिया इधर की उधर हो जाए, भाई तुम्हें बाहर नहीं निकालेंगे। बस... तुम उनको परेशान मत करना।"

विवान ने एक शरारती मुस्कुराहट के साथ सिर हिलाया। उसने ऊपर की मंज़िल की सीढ़ियों की तरफ देखा, जहाँ से अभी-अभी वह गीला तूफान गुज़रा था।

"माँ की बात नहीं टालते, हं?" विवान ने मन ही मन सोचा, "इसका मतलब, इस खडूस टेक्सटाइल किंग की चाबी आंटी के पास है। चलो, अब मज़ा आएगा।"

विवान ने फिर अपना बैग बिस्तर पर फेंका और खिड़की की तरफ बढ़ा जहाँ से वही बगीचा दिख रहा था जहाँ अभी कुछ देर पहले अभय मिट्टी खोद रहा था।

***

उधर अपने कमरे में, अभय ने फ्रेश होकर सफ़ेद शर्ट और गहरा नीला ब्लेज़र पहना। आईने के सामने खड़े होकर उसने अपने गीले बालों को सेट किया और जैसे ही ब्लेज़र का आखिरी बटन लगाया, उसकी नज़र घड़ी पर पड़ी। उसे एक ज़रूरी बोर्ड मीटिंग के लिए निकलना था।

गंभीर कदमों से चलता हुआ अभय जैसे ही सीढ़ियों के पास पहुँचा और नीचे हॉल का मंज़र देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं और माथे की नसें तन गईं।

जो हॉल सुबह तक किसी मंदिर की तरह शांत और व्यवस्थित था, वहाँ अब विवान ने अपना अड्डा जमा लिया था। सोफे के मखमली कुशन ज़मीन पर फुटबॉल की तरह बिखरे थे, और विवान का गिटार केस बीचों-बीच खुला पड़ा था।

तभी नीचे से विवान की खिलखिलाती आवाज़ आई, "अरे आर्यन! ये जैकेट मुझ पर कैसी लग रही थी? दिल्ली की शान है ये!"

इतना कहते ही विवान ने अपनी वो सतरंगी जैकेट हवा में ज़ोर से उछाली और जैकेट सीधी ऊपर की तरफ गई, जहाँ अभय खड़ा था।

उसने फुर्ती से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उस जैकेट को हवा में ही दबोच लिया।

नीचे से विवान और आर्यन की गर्दनें ऊपर की तरफ उठीं। अभय ऊपर खड़ा था, उसके एक हाथ में विवान की जैकेट थी और चेहरे पर वो खौफनाक शांति, जो किसी बड़े तूफान से पहले आती है।

"मर गए!" आर्यन मन ही मन बड़बड़ाया और अभय की दहाड़ ने हॉल के झूमर तक को हिला दिया, "ये हमारे घर की क्या हालत बना दी है?"

वो सीढ़ियों से उतरते हुए नीचे आया। विवान का हाथ मुँह के पास ही रुक गया और आर्यन झटके से सोफे से खड़ा हो गया।

"आर्यन! इस सतरंगी आफत ने घर की मंडी जैसा बना दिया है।" अभय ने जैकेट को विवान के पैरों के पास पटकते हुए कहा, उसकी आवाज़ में वो कड़कपन था जिसे सुनकर बड़े-बड़े व्यापारी पसीने छोड़ देते थे।

विवान ने डरने के बजाय एक मासूम सी बत्तीसी दिखाई और जैकेट उठाकर झाड़ने लगा, "मंडी नहीं... इस सफेद घर को रंगीन बना दिया है मैंने सर! और... और वाह! क्या कैच किया आपने जैकेट का। पक्का आप अच्छे क्रिकेटर होंगे। वैसे ये जैकेट आप पर भी जचती, बस ये चेहरा थोड़ा अकडू ना होता तो!"

"कितना बकबक करता हैं! ये मुझे भी मरवाएगा!" आर्यन ने अपने सिर पर हाथ दे मारा। 

अभय भी चीड़ गया था, उसने एक कदम और करीब आकर विवान की आँखों में देखा। सन्नाटा इतना गहरा था कि विवान को अभय के महंगे परफ्यूम की मर्दाना खुशबू और उसके गुस्से की गर्मी साफ़ महसूस हो रही थी।

अभय ने दांत पीसते हुए बहुत धीमी और खतरनाक आवाज़ में कहा, "अगले पाँच मिनट में अगर ये कचरा यहाँ से साफ नहीं हुआ, तो तुम और तुम्हारी ये सतरंगी दुनिया, दोनों सूरत की सड़कों पर होगे! समझे?"

अभय और विवान की ये पहली मुलाकात आगे क्या रंग दिखाएगी? क्या विवान की इस चुलबुली गंदगी से चिढ़ते-चिढ़ते अभय को कभी उसकी आदत लग जाएगी, क्योंकि अभय के उस फौलादी सीने के पीछे कोई ऐसी धुन दबी है जो बरसों से बेसुरी हो चुकी है। और विवान? वह तो आया ही था उस पत्थर को पिघलाकर संगीत बनाने।

कहानी की अभी तो बस शरुआत हुई है, असली मज़ा तो अब आने वाला है। पढ़ते रहिये अगला एपिसोड।

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    Sanyogita
    28 मार्च 2026
    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने, वैसे तो मैं अब कम पढती हूँ लेकिन मेरी कहानी पर कमेंट करने वालों की डीपी पर लेखक लिखा हो तो उनकी प्रोफाईल खोलकर जरूर देखती हूँ। पहला चैप्टर पढना शुरू किया तो बीच में छोड़ नही पाई, अक्सर राइटर अमीर हीरो को फुल एटीट्यूट में सूट-बूट पहने बाॅडीगार्ड वगैरह के साथ दिखा देते हैं, वो सब पढकर बोर हो चुके हैं, लेकिन आपने तो माली काका..😂 मुझे अच्छा लगा ये देखकर कि अभय बाबू मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति हैं, अपना काम खुद करने में यकीन रखते हैं, फालतू का घमण्ड नही है उनके अंदर, बस अपनी कडी मेहनत का रुतबा दिखाते हैं। माँ के आज्ञाकारी। दूसरा विवान, अनर्थकारी।😂 आर्यन तो क्यूट लगा। आपके लिखने का अंदाज भी बहुत अच्छा है और सबसे बड़ी बात, मात्राओं की कोई गलती भी नही। ऐसे ही लिखते रहिए...all the best 👍
  • author
    Piyush Puneet 360
    29 मार्च 2026
    क्रियांश जी, वाह! आपकी इस रचना को पढ़ते हुए मैं सचमुच सूरत की उस हवेली के गलियारों में पहुँच गया जहाँ विवान की सतरंगी ऊर्जा और अभय प्रताप सिंह का अनुशासन आपस में टकरा रहे हैं। जिस खूबी के साथ आपने उस दृश्य को रचा है जहाँ विवान एक रसूखदार इंसान को माली समझने की भूल कर बैठता है वह वाकई बहुत दिलचस्प है। अभय का वह पाइप से पानी गिराकर खुद को साफ करने वाला अवतार और विवान की मासूम शरारतें एक फिल्म की तरह आँखों के सामने चलने लगती हैं। आपके शब्दों में वह जादू है जो पाठकों को एक पल के लिए भी कहानी छोड़ने नहीं देता। अभय के गुस्से और विवान की चंचलता के इस विरोधाभास ने कहानी में जो सस्पेंस पैदा किया है वह अगले भागों के लिए बेताबी बढ़ा देता है। यदि कभी समय मिले तो आप भी मेरी रचना नफ़रत में लिपटी मोहब्बत को अपनी पारखी नज़रों से देख सकते हैं और अगर आपको सही लगे तो हम इस लेखन यात्रा में एक दूसरे को फॉलो करके साथ आगे बढ़ सकते हैं। सादर, पीयूष शुक्ला।
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    27 मार्च 2026
    😂😂😂 Super story
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    Sanyogita
    28 मार्च 2026
    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने, वैसे तो मैं अब कम पढती हूँ लेकिन मेरी कहानी पर कमेंट करने वालों की डीपी पर लेखक लिखा हो तो उनकी प्रोफाईल खोलकर जरूर देखती हूँ। पहला चैप्टर पढना शुरू किया तो बीच में छोड़ नही पाई, अक्सर राइटर अमीर हीरो को फुल एटीट्यूट में सूट-बूट पहने बाॅडीगार्ड वगैरह के साथ दिखा देते हैं, वो सब पढकर बोर हो चुके हैं, लेकिन आपने तो माली काका..😂 मुझे अच्छा लगा ये देखकर कि अभय बाबू मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति हैं, अपना काम खुद करने में यकीन रखते हैं, फालतू का घमण्ड नही है उनके अंदर, बस अपनी कडी मेहनत का रुतबा दिखाते हैं। माँ के आज्ञाकारी। दूसरा विवान, अनर्थकारी।😂 आर्यन तो क्यूट लगा। आपके लिखने का अंदाज भी बहुत अच्छा है और सबसे बड़ी बात, मात्राओं की कोई गलती भी नही। ऐसे ही लिखते रहिए...all the best 👍
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    Piyush Puneet 360
    29 मार्च 2026
    क्रियांश जी, वाह! आपकी इस रचना को पढ़ते हुए मैं सचमुच सूरत की उस हवेली के गलियारों में पहुँच गया जहाँ विवान की सतरंगी ऊर्जा और अभय प्रताप सिंह का अनुशासन आपस में टकरा रहे हैं। जिस खूबी के साथ आपने उस दृश्य को रचा है जहाँ विवान एक रसूखदार इंसान को माली समझने की भूल कर बैठता है वह वाकई बहुत दिलचस्प है। अभय का वह पाइप से पानी गिराकर खुद को साफ करने वाला अवतार और विवान की मासूम शरारतें एक फिल्म की तरह आँखों के सामने चलने लगती हैं। आपके शब्दों में वह जादू है जो पाठकों को एक पल के लिए भी कहानी छोड़ने नहीं देता। अभय के गुस्से और विवान की चंचलता के इस विरोधाभास ने कहानी में जो सस्पेंस पैदा किया है वह अगले भागों के लिए बेताबी बढ़ा देता है। यदि कभी समय मिले तो आप भी मेरी रचना नफ़रत में लिपटी मोहब्बत को अपनी पारखी नज़रों से देख सकते हैं और अगर आपको सही लगे तो हम इस लेखन यात्रा में एक दूसरे को फॉलो करके साथ आगे बढ़ सकते हैं। सादर, पीयूष शुक्ला।
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    🥰 Dream WRiTER
    27 मार्च 2026
    😂😂😂 Super story