Chapter 1

Chapter 1

"अगर तुम्हें अपने भाई की जान प्यारी है, तो मेरे साथ मंडप में बैठो। नहीं तो अगली गोली उसकी होगी।"

आन्या की सांसें थम गईं।

उसके सामने खड़ा था कबीऱ मेहरा — वही नाम जिससे लोग बच्चों को डराते थे। आँखों में बर्फ सी ठंडक, हाथ में गन और होंठों पर वैसा ही सन्नाटा जैसा किसी श्मशान में होता है।

उसने गर्दन झुकाकर अपने कांपते होंठ खोले, "ठीक है।"

वो शब्द जैसे खुद उसके कानों में गूंजे — पर अब कोई रास्ता नहीं था। भाई ज़िंदा था… यही काफी था।

शादी रात के ठीक बारह बजे हुई।

ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस एक मूक पुजारी, एक स्याह हवेली का अंधेरा कोना, और दो लोग जो एक-दूसरे को सिर्फ डर की नज़रों से पहचानते थे।

आन्या लाल सिल्क की साड़ी में बैठी थी, लेकिन उसका चेहरा रंगहीन था। उसकी मांग भरी गई… एक ऐसे हाथ से जो खून में रंगे थे।

कबीऱ ने उससे एक शब्द भी नहीं कहा। बस उसके सामने खड़ा रहा — पत्थर जैसा। जब फेरे शुरू हुए, तो उसके पैर खुद-ब-खुद चले, लेकिन दिल हर चक्कर के साथ और खाली होता गया।

'क्या सच में मैंने ये किया?'

हर फेरा उसे उस दरवाज़े से और दूर ले जा रहा था जहाँ उसके माँ-बाबा की तस्वीरें टंगी थीं… जहाँ उसके बचपन की आवाज़ें गूंजती थीं… और अब वो जा रही थी उस रास्ते पर, जहाँ सामने खड़ा आदमी शायद इंसान था भी या नहीं।

विवाह का अंतिम मंत्र जैसे ही पूरा हुआ, पुजारी चुपचाप चला गया।

कबीऱ ने धीरे से उसकी कलाई पकड़ी — सर्द, कठोर उंगलियाँ उसकी नब्ज़ के नीचे दब रही थीं। ना प्यार था उस छुअन में, ना अपनापन। बस अधिकार… जैसे कोई सामान खरीद लिया गया हो।

"अब तुम मेरी हो," उसने पहली बार बोला।

उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि कानों से नहीं, रूह से सुनी गई।

उसे गाड़ी में बिठाया गया। बाहर अंधेरा था, अंदर उसका भविष्य। ड्राइवर भी चुप था। साथ बैठा आदमी फोन पर निर्देश दे रहा था — किसी गिरोह, किसी डील के बारे में। लेकिन उसकी बातों में कहीं भी 'बीवी' शब्द नहीं आया।

जब हवेली के बाहर गाड़ी रुकी, तो दरवाज़े पर खड़ा चौकीदार सिर झुकाकर बोला, "स्वागत है, मेमसाहब।"

स्वागत?

ये कैसा स्वागत था?

हवेली के अंदर उसे एक बड़े से कमरे में छोड़ा गया।

कमरे की दीवारें संगमरमर की थीं, पर्दे भारी मखमल के। बेड इतना बड़ा कि उस पर अकेले लेटते डर लगे। लेकिन कमरे का दरवाज़ा…

बाहर से लॉक किया गया।

उसका गला सूखने लगा।

"कब तक इस पिंजरे में रखोगे?" उसने खुद से पूछा।

कोई जवाब नहीं।

शायद दीवारें भी डरती थीं उस नाम से… 'कबीऱ मेहरा'।

थोड़ी देर बाद दरवाज़ा फिर खुला। एक औरत चुपचाप अंदर आई — हाथ में एक लाल ट्रे थी, जिस पर सिंदूर, चूड़ियाँ और एक छोटा सा ताबीज़ रखा था।

"साहब ने भेजा है," उसने आंखें नीची करते हुए कहा।

"ये क्या है?"

"सिर्फ पहन लीजिए। सवाल मत कीजिए।"

वो चली गई। दरवाज़ा फिर से लॉक।

आन्या ने चूड़ियाँ पहनी। वो खनकती थीं… लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे हर खनक उसकी आज़ादी का मज़ाक उड़ा रही हो।

रात बीत रही थी।

कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी… सिवाय उसके दिल की धड़कनों के।

तभी एक परछाईं दरवाज़े के पास रुकी।

आन्या की सांसें थम गईं। कोई था बाहर।

फिर…

दरवाज़े का हैंडल धीरे से हिला।

बस एक इंच। फिर रुका।

उसके रोंगटे खड़े हो गए।

क्या वो अंदर आने वाला था?

कभी ऐसा डर नहीं लगा था। लेकिन…

दिल का एक कोना…

बिलकुल चुप था — और उसी चुप्पी में एक अजीब सी तड़प थी।

क्या वो दरवाज़ा खुलेगा?
क्या कबीऱ सच में सिर्फ सुरक्षा देना चाहता है… या कुछ और भी?

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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Mukesh Sharma
    30 जुलाई 2025
    मैंने कहानी आज शुरू की है देखती हूं आगे कैसे होगी
  • author
    shalini dohare
    17 जुलाई 2025
    very intense story
  • author
    Jyoti Rastogi "Jyoti Sonu Rastogi"
    24 जुलाई 2025
    story achhi lag rahi h mai ise aaj hi start kr rahi hi qki maine aaj hi insta pr apki story padhi 🫶
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    Mukesh Sharma
    30 जुलाई 2025
    मैंने कहानी आज शुरू की है देखती हूं आगे कैसे होगी
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    shalini dohare
    17 जुलाई 2025
    very intense story
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    Jyoti Rastogi "Jyoti Sonu Rastogi"
    24 जुलाई 2025
    story achhi lag rahi h mai ise aaj hi start kr rahi hi qki maine aaj hi insta pr apki story padhi 🫶